विज्ञान की कहानी धर्म से एक साफ़ टूटन के रूप में कहना आसान है। प्रबोधन अंधविश्वास की जगह ले लेता है, अवलोकन आस्था की, तर्क सत्ता की। यह सुथरा सुनाई देता है, और आधुनिक मान्यताओं को सुहाता है। पर इसमें कुछ ज़्यादा दिलचस्प और, सच कहूँ तो, उस कथा के लिए ज़्यादा असहज बात छूट जाती है: यह विचार कि ब्रह्मांड पहली बात में समझ में आने योग्य है, अपने आप में ज़ाहिर नहीं है। यह एक तत्वमीमांसक दावा है। और कैथोलिक एकेश्वरवाद उन बड़ी ऐतिहासिक वजहों में से एक है जिनकी बदौलत वह दावा वाजिब लगा।
सचमुच के पगान संसार में प्रकृति महज़ “प्रकृति” नहीं होती। वह भीड़ से भरी होती है। नदियों में आत्माएँ हैं। मौसम के अपने मिज़ाज हैं। जंगलों में उपस्थितियाँ हैं। रोग क्रोध, सौदेबाज़ी, असंतुलन या आपस में होड़ करती अदृश्य शक्तियों की अभिव्यक्ति हो सकता है। दुनिया कोई एक सुसंगत व्यवस्था नहीं, बल्कि इरादों वाली शक्तियों के बीच परतदार सौदेबाज़ी होती है। एक ऐसी दुनिया जहाँ आपको कई देवताओं और आत्माओं से प्रार्थना करनी पड़ती है ताकि वे आपकी मौजूदगी और मक़सदों के साथ हो लें। इस तरह के माहौल में प्रयोग तटस्थ नहीं होता। वह एक अलग ही अर्थ में जोखिम भरा होता है, क्योंकि नतीजों के स्थिर होने की कोई धारणा ही नहीं होती। वे महज़ हालात पर नहीं, इच्छाओं पर निर्भर होते हैं।
इसका यह मतलब नहीं कि ईसाई-पूर्व संस्कृतियाँ अवलोकन या व्यावहारिक ज्ञान में अक्षम थीं। वे साफ़ तौर पर सक्षम थीं। पर बात यह है कि जिन यूनानियों, रोमनों, मिस्रियों... ने एक तर्कशील ब्रह्मांड की वकालत की, वे सब या तो पंथेइज़्म (पूरा ब्रह्मांड ही ईश्वर है और हम उसका हिस्सा हैं) या एकेश्वरवाद (बस एक ही ईश्वर है, और ब्रह्मांड तर्कशील है और नियमों के अनुसार चलता है) की ओर सिमटने लगे। पर प्रकृति की ओर बौद्धिक रुख़ तब अलग होता है जब प्रकृति ख़ुद एक ऐसी सामाजिक जगह भी हो जो ऐसे कर्ताओं से भरी है जो आपको जवाब दे सकते हैं।
कैथोलिक एकेश्वरवाद एक बहुत अलग मान्यता पेश करता है: एक ही रचयिता है, और सृष्टि ख़ुद दैवी नहीं है, पूजने योग्य नहीं है। प्रकृति होड़ करती इच्छाओं की कोई परिषद नहीं है। भौतिक कारण-संबंध के स्तर पर वह नैतिक रूप से बँटी हुई नहीं है। वह व्यवस्था के एक ही स्रोत के नीचे एकीकृत है। इससे प्रकृति सरल नहीं हो जाती, और निश्चित रूप से पारदर्शी भी नहीं, पर वह उसे सुसंगत ज़रूर बना देता है।
और सुसंगति विज्ञान की एक भुला दी गई पूर्व-शर्त है। हम इसे हलके में लेते हैं, पर दुनिया को हमेशा नियमों (भौतिक, नैतिक या किसी भी क़िस्म के) से शासित नहीं देखा जाता था, बल्कि अलग-अलग आत्माओं और देवताओं की होड़ करती इच्छाओं से शासित माना जाता था।
आप व्यवस्थित जाँच पर तभी भरोसा करना शुरू कर सकते हैं जब आप यह मानें कि बार-बार किया गया अवलोकन सचमुच किसी स्थिर चीज़ पर आकर मिलेगा। अगर हक़ीक़त बुनियादी तौर पर होड़ करती मंशाओं से शासित है, तो निरंतरता आने वाली नहीं, सब कुछ देवताओं की इच्छाओं और भावनाओं पर निर्भर है। अगर हक़ीक़त एक तर्कशील स्रोत से शासित है, तो निरंतरता अपेक्षित हो जाती है, भले ही ब्योरे छिपे रहें। अगर एक व्यवस्था बिठा दी गई है, चाहे हम जो भी सोचें कि वह पहली बार में कैसे रची गई, तो उस व्यवस्था का भीतर से अध्ययन किया जा सकता है, कम से कम उसके बारे में तर्क तो किया ही जा सकता है। हो सकता है हम आत्मा से जुड़े पारलौकिक सत्य कभी न जान पाएँ, पर जिस ब्रह्मांड में हम रहते हैं उसे तो ज़रूर जान सकते हैं।
यहीं कैथोलिक बौद्धिक परंपरा हमारे अंदाज़े से ज़्यादा मायने रखती है। दावा यह नहीं कि ईश्वर व्याख्या की जगह ले लेता है। दावा यह है कि ईश्वर गौण कारणों से होड़ नहीं करता। दुनिया को सचमुच कार्य-कारण वाला होने की छूट है। आग आग की वजह से जलाती है। शरीर गुरुत्वाकर्षण की वजह से गिरते हैं। बीज अपनी प्रकृति के अनुसार उगते हैं। ये कोई भेस बदले हुए ईश्वरीय मिज़ाज के झटके नहीं हैं। ये सृष्टि के स्थिर ढर्रे हैं।
इस नज़रिए से, मध्यकालीन और आरंभिक आधुनिक यूरोप में आरंभिक वैज्ञानिक सोच का प्रसिद्ध उभार ईसाई सभ्यता के ऊपर तैरता कोई इत्तिफ़ाक़ नहीं है। वह इस मान्यता से गहराई से जुड़ा है कि प्रकृति अर्थ के स्तर पर अराजक नहीं है। प्रकृति हिंसक या रहस्यमय हो तब भी वह मनमानी नहीं है।
और इससे दुनिया के प्रति आपका बर्ताव बदल जाता है। आप हर परिघटना से ऐसे मोलभाव करना बंद कर देते हैं मानो उसका कोई छिपा व्यक्तित्व हो। आप पूछने लगते हैं कि वह लगातार करती क्या है। आप variables को अलग-अलग करना शुरू कर देते हैं। आप यह उम्मीद रखने लगते हैं कि वही हालात वही नतीजे देंगे, इसलिए नहीं कि आपने सही आत्मा को मना लिया है, बल्कि इसलिए कि हक़ीक़त इस तरह बनी है कि जाँच के तहत वह समझ में आती है। इसका यह मतलब नहीं कि कैथोलिक धर्म ने पूरे अर्थ में विज्ञान को “ईजाद” किया, बल्कि उसने वह ढाँचा बिठा दिया जिसमें विज्ञान इतना फलना-फूलना सका। हाँ, यूनानी दर्शन और विश्व-दृष्टियों, भारतीय अंकों और बाक़ी दुनिया की तकनीकों का इस्तेमाल करते हुए। एक पद्धति के तौर पर विज्ञान एक लंबा, बहु-सभ्यतागत विकास है। पर कैथोलिक एकेश्वरवाद ने एक अनोखा काम किया: उसने प्रकृति को लेकर एक ख़ास तरह की तत्वमीमांसक बेचैनी हटाने में मदद की। उसने दुनिया को इच्छाओं की भीड़ भरी सौदेबाज़ी जैसी कम और एक ऐसी एकीकृत व्यवस्था जैसी ज़्यादा बना दिया जिसका धैर्य से अध्ययन किया जा सके।