यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
सरल हिन्दी अर्थ: जब-जब संसार में धर्म की हानि होती है और अधर्म बढ़ता है, तब-तब भगवान स्वयं धर्म की रक्षा और अधर्म के नाश के लिए अवतार लेते हैं।
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
सरल हिन्दी अर्थ: जब-जब संसार में धर्म की हानि होती है और अधर्म बढ़ता है, तब-तब भगवान स्वयं धर्म की रक्षा और अधर्म के नाश के लिए अवतार लेते हैं।
यह गीता का कौन-सा हिस्सा है? चौथे अध्याय से लग रहा है। आपको यह श्लोक कब से याद है?
आपके लिए 'धर्म' का मतलब क्या रखता है? अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में आप इसे कहाँ देखती हैं?
यह विचार ही अनोखा है, कि जब सब गड़बड़ा जाए, तो कोई न कोई आ जाता है। बहुत ही सरल और उम्मीद भरा सूत्र है।
Hath se kulfi ka girna? Ya kulfi ka na hona? Ya haath naa hona? Ya khud girna? Kisike nazron mei girna? Ya khud ki nazron mei girna ? Ya nazroon ka hei na hona? Ya kisiko aapka dukh nazar na aana?
एक ख़ास तरह की ईसाई बोली है जो मुझे हमेशा बेचैन करती रही है। यह नैतिक दृढ़ता की भाषा अपने आप में नहीं है। ईसाइयत पाप का नाम लेने से नहीं हिचकती। यह वह स्वर है जो तब घुस आता है जब दृढ़ता चुपके से आत्म-विश्वास में बदल जाती है, मानो बोलने वाला उस हालत के बाहर निकल आया हो जिसका वह वर्णन कर रहा है।
धर्मनिरपेक्ष आधुनिक संस्कृति की सबसे मज़ेदार बातों में से एक यह देखना है कि लोग टुकड़ा-टुकड़ा करके ईसाइयत को फिर से गढ़ रहे हैं और पूरे वक़्त बौद्धिक रूप से ख़ुद को श्रेष्ठ दिखाते हैं। लोगों ने confession छोड़ दी और अब किसी को घंटे के $240 जमा taxes देते हैं कि वह किसी हलकी रोशनी वाले कमरे में उन्हें अपना अपराधबोध बयान करते सुने। उन्होंने पाप छोड़ दिया और उसकी जगह रख दी “unprocessed trauma”। उन्होंने पश्चाताप छोड़ दिया और उसकी जगह रख दी “doing the work”। उन्होंने अंतःकरण की जाँच छोड़ दी और उसकी
नास्तिक के सामने आने वाले आम प्रलोभनों में से एक है अविश्वास को साफ़-सुथरी समझ समझ बैठना, यह मान लेना कि धर्म ही तर्कहीन हिस्सा है, इसलिए धर्म हटा देने से पीछे एक ज़्यादा साफ़ और ज़्यादा तर्कशील इंसान बच रहना चाहिए। पर इंसान ऐसे काम नहीं करते, इंसान मान्यताओं, भावनाओं से चलते हैं... हम अनुष्ठान, शुद्धता, नैतिक क़बीला, पवित्रता का भाव या पारलौकिक अर्थ चाहना बस इसलिए बंद नहीं कर देते कि हमने उन इच्छाओं के लिए धार्मिक भाषा का इस्तेमाल करना बंद कर दिया।
विज्ञान की कहानी धर्म से एक साफ़ टूटन के रूप में कहना आसान है। प्रबोधन अंधविश्वास की जगह ले लेता है, अवलोकन आस्था की, तर्क सत्ता की। यह सुथरा सुनाई देता है, और आधुनिक मान्यताओं को सुहाता है। पर इसमें कुछ ज़्यादा दिलचस्प और, सच कहूँ तो, उस कथा के लिए ज़्यादा असहज बात छूट जाती है: यह विचार कि ब्रह्मांड पहली बात में समझ में आने योग्य है, अपने आप में ज़ाहिर नहीं है। यह एक तत्वमीमांसक दावा है। और कैथोलिक एकेश्वरवाद उन बड़ी ऐतिहासिक वजहों में से एक है जिनकी बदौलत वह दावा…
Constantine की church एक पीढ़ी के भीतर शाही राजनीति का औज़ार बन गई। Franco के bishops बच्चे चुराने में भागीदार बन गए। Patriarch Kirill युद्धों को आशीष देते हैं। सवाल यह नहीं कि आपको राजनीतिक प्रभाव मिलेगा या नहीं। सवाल यह है कि जिनको प्रभाव चाहिए था वे जब आपसे फ़ारिग़ हो लेंगे, तब आपने जिससे शुरुआत की थी उसमें से क्या बचेगा।
पिछले दशक के सबसे मज़ेदार बौद्धिक रुझानों में से एक यह है कि कट्टर धर्मनिरपेक्ष लोग computer की शब्दावली के सहारे धर्म को ही दोबारा गढ़ रहे हैं और फिर ऐसे पेश आते हैं जैसे इससे यह विचार ज़्यादा तर्कसंगत हो गया हो। Simulation theory इसका सबसे साफ़ उदाहरण है। बुनियादी विचार अब जाना-पहचाना है, फिर भी मैं संक्षेप में बता देता हूँ: हो सकता है हमारा ब्रह्मांड किसी कहीं ज़्यादा उन्नत बुद्धि द्वारा बनाया गया एक कृत्रिम simulation हो। हक़ीक़त शायद programmed है। Consciousness किसी रचे हुए system के भीतर
आधुनिक धर्मनिरपेक्ष elite संस्कृति मौत को लेकर कितनी असहज है, इसका एक सबसे साफ़ सबूत है Silicon Valley का इस पर बात करने का तरीका। इंसानी शरीर को ऐसे देखा जाता है जैसे कोई पुराना legacy hardware हो जो upgrade का इंतज़ार कर रहा हो। स्वीकार करने की जगह आपको मिलता है optimization: longevity startups, cryonics, अति-स्तर की biohacking, और लगातार यह क़यास कि क्या कभी इतनी computation और biotech मौत को ही हरा देगी। Tech अरबपति गर्व से बात करते हैं कि वे शायद अपनी consciousness किसी computer में डाल दें
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥ सरल हिन्दी अर्थ: जब-जब संसार में धर्म की हानि होती है और अधर्म बढ़ता है, तब-तब भगवान स्वयं धर्म की रक्षा और अधर्म के नाश के लिए अवतार लेते हैं।