किसी भी watch community में एक हफ़्ता बिताओ और असली बात जल्दी ही सामने आ जाती है। पूरी energy इस पर नहीं होती कि घड़ी कलाई पर कैसी दिखती है या पूरे दिन कैसी महसूस होती है। बात होती है रैंक की। supplied movement के मुक़ाबले in-house movement की। होंठ टेढ़े करके बोला गया "Homage"। quartz के लिए, fashion brands के लिए, और नए बंदे ने जो भी असली उत्साह में ख़रीदा उसके लिए दबी-दबी हिकारत। चीज़ ख़ुद तो लगभग बेमानी है। लोग दरअसल इस बात का मज़ा लेते हैं कि किसकी रैंक कहाँ है और तुम्हें यह पता चल जाए कि उन्हें पता है।
मैं यह उस इंसान की तरह कह रहा हूँ जो ख़ुद इसमें पूरी तरह घुसा हुआ है। यह शौक़ status की होड़ को connoisseurship का जामा पहना देता है, और जामा इसलिए जँचता है क्योंकि technical फ़र्क़ सच में होते हैं। बेहतर फ़िनिश वाला movement वाक़ई बेहतर फ़िनिश वाला होता है। पर ग़ौर करो कि बातचीत कितनी कम बार चीज़ पर टिकी रहती है और कितनी जल्दी इस फ़ैसले में बदल जाती है कि इसे पहनने वाला कैसा इंसान होगा।
इसीलिए यह सीढ़ी कभी ख़त्म नहीं होती और संतोष कभी आता नहीं। अगर तुम्हें वाक़ई घड़ियों से प्यार होता, तो एक पसंदीदा घड़ी ही काफ़ी होती। यह hierarchy गारंटी देती है कि वो काफ़ी नहीं हो सकती, क्योंकि ऊपर हमेशा एक और tier होता है, और बात कभी घड़ी की थी ही नहीं। बात रुतबे की थी।