एक सवाल, अगर छठे पेड़ तक बोरियत आ ही जानी है, तो क्या पूरे पार्क की ज़रूरत है? एक monster पेड़ देखो, दस मिनट बैठो, निकल लो। बाक़ी छह तो बस tickbox हैं ना?
सिकोया पार्क में क्या सच में सिर्फ़ "साइज़ मायने रखता है"?
देखो, पेड़ बहुत बड़े हैं। इस बात का श्रेय तो देना ही पड़ेगा। ये बेहद बड़े हैं। जब पहली बार किसी giant sequoia को देखते हो, तो सच में आपके scale के एहसास को हिला कर रख देता है। आप एक गहरे, करीब-करीब आध्यात्मिक तरीके से ख़ुद को छोटा महसूस करते हो, जैसे थोड़ी देर के लिए आपको याद दिला दिया गया हो कि इंसान दरअसल राय रखने वाली सजावटी चींटियाँ भर हैं।
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एक सवाल, अगर छठे पेड़ तक बोरियत आ ही जानी है, तो क्या पूरे पार्क की ज़रूरत है? एक monster पेड़ देखो, दस मिनट बैठो, निकल लो। बाक़ी छह तो बस tickbox हैं ना?
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देखो, पेड़ बहुत बड़े हैं। इस बात का श्रेय तो देना ही पड़ेगा। ये बेहद बड़े हैं। जब पहली बार किसी giant sequoia को देखते हो, तो सच में आपके scale के एहसास को हिला कर रख देता है। आप एक गहरे, करीब-करीब आध्यात्मिक तरीके से ख़ुद को छोटा महसूस करते हो, जैसे थोड़ी देर के लिए आपको याद दिला दिया गया हो कि इंसान दरअसल राय रखने वाली सजावटी चींटियाँ भर हैं।
पर ये असर जितना टिकना चाहिए उससे जल्दी ख़त्म हो जाता है। छठे-सातवें पेड़ तक आते-आते दिमाग़ अभ्यस्त हो चुका होता है। उस समय बस इतना रह जाता है: हाँ, अब भी एक बड़ा पेड़। अब भी पेड़ वाले काम कर रहा है। वहीं खड़ा है। बड़ा सा।
नहीं यार, इस पार्क की मैं बुराई नहीं कर सकता। ये वाला कमाल का है। ज़रूर जाओ। यहाँ भीड़ की लंबी लाइनें हैं। गाड़ियाँ हैं, लोग हैं। फिर भी, जाओ।
Thoughts
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Permalinkपिछले साल मैं Munnar गया था, पहली घाटी देखकर गाड़ी रुकवाई, फ़ोटो खींची, गला भर आया। तीसरी घाटी तक मैं पीछे की सीट पर सो रहा था। बीवी ने जगाया, मैंने कहा हरी है, हाँ, चलो। तुम्हारा "अब भी एक बड़ा पेड़" वाला line पढ़कर ठीक वही याद आ गया।
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Permalinkएक सवाल, अगर छठे पेड़ तक बोरियत आ ही जानी है, तो क्या पूरे पार्क की ज़रूरत है? एक monster पेड़ देखो, दस मिनट बैठो, निकल लो। बाक़ी छह तो बस tickbox हैं ना?
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Permalinkजिस "छोटे होने" के एहसास की बात है, वो पेड़ का नहीं, उसकी उम्र का है। इनमें से कई sequoia दो-ढाई हज़ार साल के हैं। तुम जिस पल वहाँ खड़े हो, वो उस पेड़ के लिए एक पलक है। size हिलाता है, पर असल चोट timeline करती है, और timeline पर दिमाग़ अभ्यस्त नहीं होता, बस वो दिखता नहीं।
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Permalink"राय रखने वाली सजावटी चींटियाँ" इस पूरी site का सबसे ईमानदार bio है।
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Permalinkपहले एक तस्वीर देखने के लिए magazine खरीदना पड़ता था, या cyber cafe में dial-up पर आधा घंटा download करना पड़ता था। तब एक sequoia की एक फ़ोटो ही महीने भर का wow थी। अब हज़ार फ़ोटो जेब में हैं, तो असली पेड़ के सामने भी दिमाग़ बोलता है, देखी हुई है। habituation नया नहीं, बस तेज़ हो गया।
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Permalinkअसर इसलिए जल्दी मरता है क्योंकि तुम सातों पेड़ एक के बाद एक parking से देख रहे हो। दो घंटे ऊपर चढ़ो, साँस फूल जाए, फिर एक sequoia मिले, तो वो छठा नहीं लगता। थकान scale वापस लौटा देती है। भीड़ और लाइन में wow सस्ता हो जाता है।
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Permalinkये वही चीज़ है जो training में होती है। पहली बार 100 किलो उठाओ तो दुनिया रुक जाती है। दसवीं बार वो बस मंगलवार है। शरीर हो या पहाड़, हर नई चीज़ की अपनी expiry है, और उसके बाद उसे enjoy करना एक अलग skill बन जाता है।
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Permalinkछठे पेड़ तक दिमाग़ अभ्यस्त हो जाता है, ये पूरी travel industry की चोरी की बात है। ताज महल का भी यही हाल है, पहले दो मिनट साँस रुकती है, फिर तुम सोचते हो कि selfie कहाँ से अच्छी आएगी। दिक़्क़त पेड़ में नहीं, हमारे wow का shelf life छोटा है।