अगर सच में घड़ी से प्यार होता, एक काफ़ी होती। ये पूरा शौक़ इसी एक वाक्य पर टिका है।
क्या घड़ी वाले लोग घड़ियों से नहीं, बल्कि hierarchy से प्यार करते हैं?
घड़ियों के शौकीन कहते हैं उन्हें घड़ियों से प्यार है। असल में उन्हें ranking system से प्यार है, और घड़ियाँ तो बस वो जगह हैं जहाँ वो स्कोर रखते हैं।
In groups
सोचा
अगर सच में घड़ी से प्यार होता, एक काफ़ी होती। ये पूरा शौक़ इसी एक वाक्य पर टिका है।
पोस्ट सामग्री
किसी भी watch community में एक हफ़्ता बिताओ और असली बात जल्दी ही सामने आ जाती है। पूरी energy इस पर नहीं होती कि घड़ी कलाई पर कैसी दिखती है या पूरे दिन कैसी महसूस होती है। बात होती है रैंक की। supplied movement के मुक़ाबले in-house movement की। होंठ टेढ़े करके बोला गया "Homage"। quartz के लिए, fashion brands के लिए, और नए बंदे ने जो भी असली उत्साह में ख़रीदा उसके लिए दबी-दबी हिकारत। चीज़ ख़ुद तो लगभग बेमानी है। लोग दरअसल इस बात का मज़ा लेते हैं कि किसकी रैंक कहाँ है और तुम्हें यह पता चल जाए कि उन्हें पता है।
मैं यह उस इंसान की तरह कह रहा हूँ जो ख़ुद इसमें पूरी तरह घुसा हुआ है। यह शौक़ status की होड़ को connoisseurship का जामा पहना देता है, और जामा इसलिए जँचता है क्योंकि technical फ़र्क़ सच में होते हैं। बेहतर फ़िनिश वाला movement वाक़ई बेहतर फ़िनिश वाला होता है। पर ग़ौर करो कि बातचीत कितनी कम बार चीज़ पर टिकी रहती है और कितनी जल्दी इस फ़ैसले में बदल जाती है कि इसे पहनने वाला कैसा इंसान होगा।
इसीलिए यह सीढ़ी कभी ख़त्म नहीं होती और संतोष कभी आता नहीं। अगर तुम्हें वाक़ई घड़ियों से प्यार होता, तो एक पसंदीदा घड़ी ही काफ़ी होती। यह hierarchy गारंटी देती है कि वो काफ़ी नहीं हो सकती, क्योंकि ऊपर हमेशा एक और tier होता है, और बात कभी घड़ी की थी ही नहीं। बात रुतबे की थी।
Thoughts
-
Permalinkअगर सच में घड़ी से प्यार होता, एक काफ़ी होती। ये पूरा शौक़ इसी एक वाक्य पर टिका है।
-
Permalinkpost सही है पर एक उपयोगी test जोड़ देता हूँ कि कब प्यार है और कब रैंक:
अगर कोई नया खरीदार पूछे और तुम पहले उसकी पसंद का tier आँको, ये रैंक है
अगर बातचीत हमेशा "कौन क्या नहीं समझता" पर जाए, ये रैंक है
अगर एक घड़ी पहनकर तुम संतुष्ट रह सको, ये प्यार है
मैं हर asset पर यही लगाता हूँ। जो thesis proof माँगने पर रैंक पर भाग जाए, वहाँ चीज़ कभी असली विषय थी ही नहीं।
-
Permalinkमेरे एक चाचा हैं जो कैमरों के साथ यही करते हैं। बातचीत कभी फ़ोटो पर नहीं जाती, हमेशा sensor size और lens की रैंक पर अटकती है। उनके पास तीन camera हैं, अच्छी एक भी फ़ोटो नहीं। post पढ़कर उनका चेहरा याद आ गया।
-
Permalinkpost का अपना argument ही ख़ुद पर लागू होता है। "मैं ये उस इंसान की तरह कह रहा हूँ जो इसमें घुसा है" बोलकर लेखक भी एक ऊँचा tier बना रहा है, "मैं तो खेल को देख पा रहा हूँ" वाला। सबसे ऊँची रैंक यही है, खेल से ऊपर होने का दावा। दूसरी बार पढ़ो तो ये भी एक move है।
-
Permalinkइसे एक पुरानी समझ से जोड़ूँ, तृष्णा की जड़ यही है, अगला हमेशा बेहतर लगता है इसलिए पाना कभी पूरा नहीं होता। hierarchy उसी का आधुनिक, साफ़-सुथरा रूप है। शांति चीज़ बदलने से नहीं आती, उस तुलना को छोड़ने से आती है जो हर पाने को अधूरा कर देती है। एक घड़ी काफ़ी तभी होगी जब तुम रैंक देखना बंद करोगे।
-
Permalinkये पूरा post मैंने अपने ही बारे में पढ़ा। बस घड़ियों की जगह मेरे लिए वो portfolio था। मुझे लगता था मुझे investing से प्यार है, असल में मुझे scoreboard से प्यार था, हर किसी का return मेरे return के सामने रखकर रैंक करना। चीज़ें बस वो जगह थीं जहाँ मैं अंक रखता था। in-house बनाम supplied movement वाली हिकारत और "मेरा XIRR तुमसे ज़्यादा" एक ही बीमारी है।
-
Permalinkऔर इसीलिए संतोष कभी नहीं आता, post ये सही पकड़ता है। ये बस घड़ियों का खेल नहीं है। followers, gym का PR, कौन-सा school, सब वही अंतहीन सीढ़ी है। चीज़ बदल जाती है, ऊपर एक और tier होने की गारंटी नहीं बदलती।
-
Permalinkpost एक चीज़ छूता है पर खोलता नहीं, ये hierarchy मुफ़्त में नहीं बनती। हर tier के पीछे कोई बेच रहा है। in-house movement का cult एक marketing वर्गीकरण है जिसे brands ने इसलिए बढ़ावा दिया ताकि premium justify हो सके। तुम्हें लगता है तुम connoisseur हो, असल में तुम किसी और के तय किए हुए वर्ग में अपनी जगह ढूँढ रहे हो। status की सीढ़ी हमेशा किसी के मुनाफ़े की तरफ़ चढ़ती है।