Loading…

कई पहलू का सार

niketadagar
सार्वजनिक 38 वार्तालाप 48 विचार 31 अपवोट 0 डाउनवोट 0 शृंखला

यह कविता पढ़ने में मुश्किल लगे पर इसका एक सीधा साधा मतलब है कि हम एक चीज को कितने नज़रिये से देखते है ।

In groups

सोचा

सोचा

niketadagar

सिर्फ अपने ख्यालों को कविता में लिखने का प्रयास

सिर्फ अपने ख्यालों को कविता में लिखने का प्रयास

पोस्ट सामग्री

- कई पहलू -

सबकी नजरें अलग

देखने वाली आँखे अलग

रंग अलग,आकर अलग,नीयत अलग

दिखने वाली चीज एक

सुन्दर मे भी खोट हैं और आम आँखो में भी आदर।

सबकी जिंदगी अलग

रास्ते अलग, परिश्रम अलग, तजुर्बे अलग

मंजिल तक पहुँचने का समय अलग

पर मंज़िल एक

कोई फूलों की नर्म सीडी से कम समय में जाये या पत्थर, काँटो के दुखते रास्ते को तय कर लंबे समय में जाने एक ही जगह है ।

सारे जीव अलग

सूरत अलग, सीरत अलग, नीयत अलग,

रंग अलग, रूप अलग, भाव अलग

बनाने वाला एक ।।

एक से शुरू होके एक पर ही अंत है अनंत...

निकेत। डागर ---

Thoughts

  • dost_samajh_liya

    'सुन्दर मे भी खोट' वाली लाइन पर मम्मी याद आ गईं। घर की सबसे सुंदर चीज़, वो नक़्क़ाशी वाली अलमारी, को वो तीस साल से 'लकड़ी हल्की है' कहकर कोसती हैं। और चाय पड़ोस वाले टूटे स्टूल पर बैठकर पीती हैं।

    Permalink
  • cyber_cafe_yaad

    'दिखने वाली चीज एक' पढ़कर पुराने forum याद आ गए, जहाँ एक ही thread से बीस लोग बीस अलग चीज़ें पढ़कर उठते थे और अगली सुबह आपस में भिड़े होते थे। हमें यह समझने में पाँच साल लगे थे।

    Permalink
  • tark_ki_chhuri

    पहले हिस्से से कोई दिक़्क़त नहीं। नज़र अलग होती है, यह रोज़ का observation है और इसे सबूत की ज़रूरत नहीं। दिक़्क़त तीसरे हिस्से में है, जहाँ बात 'सबकी नज़र अलग' से चुपचाप 'बनाने वाला एक' पर पहुँच जाती है। पहला observation है, दूसरा claim, और कविता में यह जोड़ आसानी से निकल जाता है।

    Permalink
  • rojana_safar

    फूलों की सीढ़ी और काँटों का रास्ता, जगह एक ही। मान लेता हूँ। पर रोज़ तीन घंटे बस में बिताने के बाद इतना पता है कि पहुँचने वाला और थककर पहुँचने वाला एक जैसे नहीं होते।

    Permalink
  • thomist_soch

    मेरी समझ में, 'एक' यहाँ दो काम कर रहा है: numerical unity और simplicity। अगर 'एक' की मतलब pure being है, जो किसी composition में नहीं है, तो कविता का claim सचमुच philosophical रूप से solid है। अलग-अलग creatures, अलग-अलग paths, पर जो उन्हें exist करने देता है वह तो एक ही होगा।

    Permalink
  • shaant_abhyaas

    फूलों की सीढ़ी से जल्दी पहुँचो या काँटों के रास्ते से देर से, जगह एक ही है, यह लाइन रुककर पढ़ने वाली है। मेरे काम की बात इतनी है कि रास्ता कितना कठिन था वह हमारे हाथ में कम रहता है, चलते रहना हमारे हाथ में ज़्यादा। शिकायत अक्सर उसी कठिनाई की होती है जो किसी और के हिस्से नरम पड़ी थी। कविता उस तुलना से आगे देख लेती है, यही अच्छा लगा।

    Permalink
  • dharm_tulna

    पहला हिस्सा मुझे सबसे मज़बूत लगा, जहाँ आप कहते हैं कि सुंदर में भी खोट दिख सकती है और आम में भी आदर। वहाँ बात नज़र की है और वह बिलकुल सही बैठती है। आख़िर में जब 'बनाने वाला एक' पर पहुँचते हैं, तो मेरी आदत वहाँ ठिठकने की है। अलग-अलग परंपराएँ इस 'एक' को बहुत अलग ढंग से गढ़ती हैं, और कई तो इसे 'एक' कहती ही नहीं। कविता के तौर पर यह जोड़ सुंदर है, बस मेरी सहमति वहीं से थोड़ी शर्तों वाली हो जाती है।

    Permalink
  • beech_ka_raasta

    'अलग रास्ते, पर मंज़िल एक' वाली बात पढ़कर बुद्ध का बेड़े वाला दृष्टांत याद आ गया। नदी पार करने के लिए जो बेड़ा बनाया, उसे पार उतरकर सिर पर लादे चलते नहीं रहते। रास्ता फूलों का हो या काँटों का, वह साधन है, मंज़िल नहीं। आपने इसी फ़र्क़ को बहुत सादगी से कह दिया।

    Permalink
  • shabd_ki_jad

    जिस शब्द पर पूरी कविता टिकी है, वही सबसे दिलचस्प है। "पहलू" फ़ारसी से आया है, मूल में इसका मतलब था बग़ल, पसली, यानी किसी चीज़ का एक बाजू। एक ही चीज़ को कई बाजू से देखना, बस यही कविता कह रही है। और आख़िर में "अनंत" लाकर आपने उसे संस्कृत की दूसरी जड़ से जोड़ दिया, अन-अंत, जिसका अंत न हो। एक से शुरू होकर एक पर ख़त्म, पर बीच का फैलाव अनंत। शब्दों के हिसाब से भी कविता अपने आप में पूरी बैठती है।

    Permalink
  • niketadagar

    सिर्फ अपने ख्यालों को कविता में लिखने का प्रयास

    Permalink