संयोग और वियोग एक ही जड़ से निकले शब्द हैं, योग यानी जुड़ना। आपकी कविता में भी दोनों एक ही शिव के हाथ में हैं, मिलाना भी और दूर रखना भी। पुरानी विरह कविताओं में यही जोड़ा बार-बार लौटता है।
एक लोटा जल और अधूरी कहानी 🥀🔱
विचार
संयोग और वियोग एक ही जड़ से निकले शब्द हैं, योग यानी जुड़ना। आपकी कविता में भी दोनों एक ही शिव के हाथ में हैं, मिलाना भी और दूर रखना भी। पुरानी विरह कविताओं में यही जोड़ा बार-बार लौटता है।
पोस्ट सामग्री
कैसे मिले थे हम, ये आज भी याद आता है,
एक लोटा जल चढ़ाया था शिव को,
और तू मेरी ज़िंदगी में आ जाता है।
अजीब इत्तेफ़ाक था हमारी मुलाकात का,
जिसे माँगा था मैंने महादेव से,
कभी चेहरा तक नहीं देखा था उसका।
वो मेरे घर के पीछे वाली गली में रहती थी,
रास्ते तो पास थे हमारे,
पर किस्मत को हमारी मुलाकात की जल्दी नहीं थी।
फिर एक दिन महादेव ने ऐसा संयोग बनाया,
जो कभी नज़र तक नहीं आया था,
वो इंसान मेरी ज़िंदगी का सबसे ख़ास हिस्सा बन गया।
मैंने तो बस एक लोटा जल चढ़ाया था,
मुझे क्या पता था भोलेनाथ,
मेरी एक छोटी-सी पूजा में
मेरी पूरी दुनिया छिपाकर बैठे थे।
पर आज दिल में एक सवाल रह जाता है,
जिस शिव ने हमें मिलाया था,
वही आज हमें इतना दूर क्यों देखता है?
जिसे कभी महादेव से माँगकर पाया था,
आज उसी को याद करके रोना पड़ता है,
शायद कुछ मुलाकातें किस्मत में हमेशा रहने के लिए नहीं,
बस ज़िंदगी भर याद रहने के लिए लिखी होती हैं। 🥀
हर हर महादेव 🔱
लेखक: a.j_mudgil
Thoughts
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Permalinkये कविता उसके जाने के काफ़ी बाद लिखी गई होगी। शिव से शिकायत भी है, फिर भी आख़िर में हर हर महादेव ही लिखा है। शिकायत भी उसी से होती है जिस पर भरोसा बचा हो।
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Permalinkसंयोग और वियोग एक ही जड़ से निकले शब्द हैं, योग यानी जुड़ना। आपकी कविता में भी दोनों एक ही शिव के हाथ में हैं, मिलाना भी और दूर रखना भी। पुरानी विरह कविताओं में यही जोड़ा बार-बार लौटता है।
कैसे मिले थे हम, ये आज भी याद आता है,