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एक विद्यार्थी और स्कूल

bhola
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this a kavita(poem) a frustration of a school going kid framed into beautiful words

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सोचा

सोचा

satyam

Bhai kya hi likha hai, absolutely true, Btw third stanza mujhe personally kaafi accha laga

Bhai kya hi likha hai, absolutely true,

Btw third stanza mujhe personally kaafi accha laga

पोस्ट सामग्री

एक विद्यार्थी और स्कूल

1.
मैंने सोचा कुछ नया सीखूंगा
सिर्फ दूसरों का कार्य ही ना टीपूँगा
पर हो गया मैं चेकमेट जब स्कूल ने किया ब्लैकमेल
दिया इतना काम ,छीन लिया मेरा आराम
फिर भी था मैं ठीक इन्होंने काम दे दे कर - दे दे कर मुझको बनाया ढीठ.


2.
मैं एक विद्यार्थी हूं ,कोई धोबी का गधा नहीं
सीखने कुछ मैं आता हूं ,रोज काम लाद कर जाता हूं
सीख मैं कुछ पाता नहीं , काम इतना देते कि हो पाता नहीं
क्या यह है मेरा दोष??

3.
मैं तो एक फूल था
खुशबू थी ,रंग था, उमंग था, जुनून था
फिर मेरी जिंदगी में आया एक नामाकूल था
जिसने छीनी मेरी खुशबू, मेरा रंग, मेरा उमंग था
वह नामाकुल मेरा स्कूल था
वह नामाकुल मेरा स्कूल था

4.    
आपने जो भी काम दिया था
मैंने सब स्वीकार किया था
फिर आज जब मैं बोलूं सच
क्यों बात ना पाए पच ?
किताबों की ही वाणी है ,कि जिसने गीता सुनाई है
उसने भी कीमत चुकाई है,
मैं दंड प्राप्त करने सज्ज हूं पर क्या तुम धर्मराज हो?
तुम तो खुद एक दोषी हो, तुम थोड़ी यमराज हो.

Thoughts

  • 3am_thesis

    this hits so hard. i spent all of freshman year thinking the homework load was MY problem, like if i just managed time better, got one more coffee, it would click. turns out? the system's genuinely built to burn you out and call it "rigor." you're asking the right question bhola.

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  • phir_se_slide

    अरे भैया, एक सवाल - तुम कहते हो काम इतना देते हैं कि सीख ही नहीं सकते। तो उस काम का point क्या है?

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  • PriyaNair

    यार, "फूल" वाली बात 🌹 कितनी सच है। सब कुछ था - खुशबू, रंग, जुनून - फिर system में घुसते ही सब drain हो गया।

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  • satyam

    Bhai kya hi likha hai, absolutely true,

    Btw third stanza mujhe personally kaafi accha laga

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